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ज़रूरत है समझदार बाप-भाइयों की...
Publish Date :
12/16/2013

New Delhi: स्त्रियों पर अत्याचार के कुछ समाचारों से आंदोलित होने पर एक आलेख कुछ दिन पहले लिखा था, जिसे सराहे जाने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद... परंतु विश्वास कीजिए, आपसे मिल रही सराहना के स्थान पर यदि आपमें से कुछ के मन-मस्तिष्क में स्त्री के प्रति सम्मान का भाव जागा, तो आलेख को ज़्यादा सफल मानूंगा...

बहरहाल, इस वक्त मेरा इरादा यह नहीं है... इरादा है, उसी चर्चा को कुछ और आगे ले जाने का... पिछले आलेख में मैंने एक स्थान पर लिखा था, महिला ही महिला की सबसे बड़ी शत्रु सिद्ध होती हैं... क्या हमने कभी सोचा है, ऐसा क्यों है... आज मेरी इच्छा इसी पहलू पर चर्चा करने की है...

कोई भी महिला मानव जीवन की सर्वाधिक कष्टदायक शारीरिक प्रक्रिया से गुज़रकर एक बच्चे को जन्म देती है... चीखती-पुकारती रही उस महिला के चेहरे पर असहनीय कष्ट के बाद आत्मसंतुष्टि और गौरव की जो मुस्कान बच्चे के जन्म के तुरंत बाद दिखाई देती है, वह सिद्ध कर देती है कि कोई महिला कितना सहन कर सकती है... यह सहनशीलता लासानी है, जिसे सिर्फ एक महिला ही समझ सकती है, परंतु सबसे अफसोसनाक पहलू यह है कि इसके बावजूद महिला ही महिला का सत्यानाश करने में सबसे आगे रहती है...

मेरी समझ में इसका एक कारण हमारे समाज का सदियों से पुरुषप्रधान होना है, जिसमें अपना महत्व बनाए रखने के लिए महिला खुद को बिल्कुल वैसा बनाने की कोशिश में जुटी रहती है, जैसा उसे पुरुष देखना चाहते हैं...

अब एक उदाहरण... इस समाज ने सदियों पहले कुछ व्रत-उपवास आदि के कुछ नियम बनाए, जिन्हें पढ़ी-लिखी औरतें आज भी स्वीकार करती हैं... सबसे पहले स्पष्ट कर देना चाहूंगा, मुझे इस तरह के किसी नियम से कोई आपत्ति नहीं, परंतु उनके औचित्य पर कुछ सवाल मेरी नज़र में खड़े नज़र आते हैं, जिनका जवाब ढूंढना मुझे ज़रूरी लगता है... करवाचौथ का व्रत पति-परमेश्वर के दीर्घायु होने की कामना से रखा जाता है, और होई का व्रत अपने पुत्रों की भलाई की इच्छा से... इसमें जो दो सवाल मेरे मन में कौंधते हैं, वे हैं - क्या पत्नी की आयु लंबी होना दुखकर होता है, या पुत्री की उम्र ज़्यादा हो जाने पर कोई नुकसान पहुंचता है... यदि इन सवालों का जवाब इंकार में हैं, तो किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के लिए व्रत रखे जाने का नियम इस समाज में क्यों नहीं है... या होई का व्रत रखने वाली महिला पुत्रों के साथ-साथ अपनी पुत्री के लिए भी परमात्मा से प्रार्थना क्यों नहीं कर सकती...

इसमें जो सवाल सामने आए हैं, उनसे ज़्यादा बड़े सवाल और भी हैं... क्यों किसी महिला ने कई शताब्दियां बीत जाने के बावजूद आज तक इस पर सवाल नहीं किया... क्यों अपनी ही नस्ल में पैदा हुई पुत्रियों को बराबर सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए महिलाओं ने आंदोलन नहीं किया... क्यों महिला अधिकारों की पैरोकारी करने वाले पुरुष आज तक इन सवालों पर चुप रहे...
 

 
 
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