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सोनिया सारे देश की मां' कहते ही खुर्शीद को बर्खास्त कर देते तो...?
Publish Date :
12/16/2013



कांग्रेस नेतृत्व में छटपटाहट है। बदलने की। 'आप कल्पना भी नहीं कर सकते, मैं कांग्रेस को इतना बदल दूंगा,' यह कहा था राहुल गांधी ने। चार राज्यों में बुरी तरह हार जाने के ठीक बाद। निश्चित रूप से वे बदल ही रहे होंगे। किन्तु अब एक विचलित कर देने वाला कथन आया है। हर संवेदनशील भारतीय को उद्वेलित कर देने वाला कथन। कांग्रेस के बहुत ही वरिष्ठ नेता ने दिया है। सलमान खुर्शीद ने। केंद्र में लंबे समय से मंत्री हैं वे। उन्होंने चौंकाते हुए कहा : 'सोनिया गांधी सिर्फ राहुल गांधी की मां नहीं हैं। हम सब की मां हैं। वे सारे देश की मां हैं!' संवेदनशील भारतीय इससे चौंके ही नहीं, बुरी तरह क्रोधित भी हुए हैं। यह भारत का अपमान है। यह 'मां' जैसे सर्वोच्च रिश्ते का अपमान है। यह सोनिया गांधी का भी अपमान है।

आप चाहें तो इसे 'कांग्रेस की चापलूसी संस्कृति' कहकर सिरे से रद्द कर सकते हैं। साइकोफेन्सी। हजारों-लाखों बार 'चापलूसी' पर लिखा जा चुका है। किन्तु कोई अंतर नहीं आया। बल्कि बढ़ती ही जा रही है। 'इंदिरा इज इंडिया' के लिए विवाद में रहे कांग्रेस के देवकांत बरुआ को वास्तव में जिस कथन के लिए विवादित ही नहीं प्रताडि़त भी किया जाना चाहिए था - वह था आपातकाल के लागू होने के बाद पहले कांग्रेस अधिवेशन में उनका विश्लेषण। उन्होंने कहा था - महान् सम्राट अशोक और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दोनों को मिलाकर यदि एक व्यक्तित्व बनाएं तो वह इंदिरा गांधी हैं!
सूची लंबी है। चापलूसी ही इतनी लंबी है।
किन्तु इसका उपाय क्या है? कैसे पता चले कि कोई सच्ची प्रशंसा कर रहा है या कि झूठी?
कभी भी आसान नहीं होगा इनका पता लगाना। क्योंकि प्रशंसा वो शराब है, जो कानों से पी जाती है। इसका नशा इतना गहरा और इतना अज्ञात रहता है कि प्रशंसा पा रहा व्यक्ति - चाहे जितना बड़ा हो- सोच ही नहीं पाता। समझ ही नहीं पाता।
फिर भी एक उपाय तो है। जो सत्य है ही नहीं, हो ही नहीं सकता, होगा ही नहीं - उसे तो स्पष्टत: झूठ मान सकते हैं। चापलूसी मान सकते हैं। मान सकते हैं कि वह किसी अनुचित लाभ के लिए कही गई बात है। ऑक्सफोर्ड, वेबस्टर हो या चेम्बर्स डिक्शनरी, सभी में साइकोफेन्ट को एक ऐसा व्यक्ति बताया है जो 'किसी शक्तिशाली या प्रभावशाली हस्ती से लाभ उठाने के लिए, उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ न कुछ कहता या करता रहता है।


'जो सत्य है ही नहीं' में स्पष्ट है खुर्शीद की खुशामद आती है। इसे समझने की आवश्यकता नहीं है। कोई तर्क नहीं है।
और खुर्शीद कोई छुटपुट कांग्रेसी तो हैं नहीं। कोई ऐसे नेता भी नहीं है कि जैसे-तैसे केंद्रीय मंत्री बन गए। वे तो लंबे-चौड़े, खानदानी और रसूखदार परिवार से हैं। डॉ. जाकिर हुसैन, हमारे तीसरे राष्ट्रपति, के नाती हैं खुर्शीद। पिता खुर्शीद आलम खान लगातार केंद्रीय मंत्री रहे। और परिवार ही नहीं, पढ़ाई में भी अव्वल दर्जे के हैं वे। अलीगढ़, सेंट स्टीफन्स और ऑक्सफोर्ड। बहुत पढ़े-लिखे। दानिशवर। लेखक अलग हैं। स्कूल-कॉलेज में नाटकों में अभिनय करते थे, सो अलग।
तो 'सोनिया सारे देश की मां' क्या था? उनकी शिक्षा थी? या कि नाटक? बर्खास्त कर देते उन्हें तत्काल ऐसा कहने पर - तो कांग्रेस में भविष्य में किसी की हिम्मत नहीं होती ऐसी चापलूसी की। मुरादाबाद में कांग्रेसियों ने 'दुर्गा' बना दिया था सोनिया गांधी को। जबलपुर में झांसी की रानी। कुछ नहीं हुआ। कल्चर बन गया। कुंभ में बाकायदा पोस्टर बने।

एक में सोनिया वही झांसी की रानी, राहुल गांधी पीठ पर बंधे हुए। दूसरे में राहुल गांधी के साथ भगवान शिव। जयपुर महाधिवेशन में दिया उनका कथन : '... सत्ता जहर होती है..' लिखकर उनसे विनम्र अपील 'कि इस जहर को पीकर शिव बनिए , राहुल जी ...।'


अनंत है। किन्तु अंत इसलिए नहीं है क्योंकि न तो सोनिया गांधी को इन सब पर कठोर आपत्ति है न राहुल गांधी को। आपत्ति क्या, ऐसा करने वाले पार्टी में बने रहते हैं। बढ़ते रहते हैं। स्पष्ट है पसंद आते हैं।
वॉल स्ट्रीट जर्नल में ब्लॉग लिखते हुए तृप्ति लाहिड़ी ने तमिलनाडु के कांग्रेसी एच. वसंथकुमार के 'द हिन्दू' के पूरे पहले पन्ने के विज्ञापन का जिक्र किया है जो रोचक है। इसमें वसंथकुमार ने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था : वी रिमेन, मैडमजी, एवर एट योर फीट! रोचक यह नहीं था। रोचक तो वसंथकुमार से बातचीत थी। उनका कटाक्ष था कि 'हर व्यक्ति अपने नेता की भूरि भूरि' प्रशंसा करता है। क्यों न करे? हर कोई कर रहा है, मुझे क्यों अलग से पूछा जा रहा है।


सच ही तो है, सारी पार्टी ही चरणों में पड़ी है। नरेंद्र मोदी के भी। भाजपा का भी तो यही हाल है। अभी पिछले महीने की बात है। लखनऊ में पार्टी कार्यालय पर बैनर लगा : हर प्रदेश को बनाएंगे मोदी प्रदेश!
यह क्या है? भाजपा का कांग्रेसीकरण। गुजरात में लोकप्रिय रहे 'मोदी मुखौटे' भी तो चरम ही था। नरेंद्र मोदी को कब न.मो. बना डाला और कुछ चुपके से ...शिवाय जोड़कर ईश्वर सदृश दिखाने का प्रयास एक झकझोर देने वाली चापलूसी ही तो है। कहां मोदी मना करते हैं या सख्ती कर, किसी को बर्खास्त करते हैं ?
'छोटे सरदार' के रूप में उन्हें पूज रहे भाजपाइयों को किसने रोका? 'छप्पन इंच छाती' पर किसने रोका? आज स्वयं को कांग्रेस-मुक्त भारत बनाने से संकल्पित कर राष्ट्रीय संघर्ष के लिए निकले नरेंद्र मोदी अपनी ही पार्टी की इस कांग्रेसी संस्कृति को यदि नहीं कुचल रहे हैं तो कल यह शत्रु, रोग और ऋण की तरह विकराल रूप धारण करेगी ही।
राजनीतिक नेतृत्व हो या कि जीवन के अलग-अलग मोर्चे पर कार्यरत नेतृत्व, सब कहते यही हैं कि उन्हें 'आलोचना' सुननी है - ताकि बेहतर बन सकें, सुधार कर सकें। किन्तु कहते ही हैं। चाहते सभी प्रशंसा हैं। सत्ता मोह से पूरी तरह दूर रहने वाले वयोवृद्ध अन्ना हजारे भी स्वयं को 'महात्मा गांधी' कहलवाने में प्रसन्न ही होते दिखे। किसी को बर्खास्त नहीं किया उन्होंने भी ऐसे झूठ के लिए।
सत्ता के साथ-साथ जुड़े होते हैं चापलूस। जूलियस सीजर, नेपोलियन बोनापार्ट, अलेक्ज़ेंडर हों या कि हमले के लिए ही पैदा हुए आततायी चंगेज और तैमूर हों या अकबर द ग्रेट कहलाए मु$गल सुल्तान - सबके गिर्द उतने ही चापलूस थे जितने चंद्रगुप्त, सम्राट अशोक या राज राजा चोला के। अंतर यही है कि तब वे स्वेच्छाचारी थे। उनकी इच्छानुसार शासन व शासित - सब चलते थे। सो चापलूस भी चलते थे। चापलूसों का सिर कलम भी कर दिया जाता था। निर्ममता से। इसलिए शासन में भय रहता था।
आज तो लोकतंत्र है। कितना भी लंबा शासन चल जाए, कोई भी जनता नष्ट कर सकती है। कर देती है। इंडिया इज इंडिया। दैट्स इट।
राजनीति में चापलूस खत्म हो जाएं, यह असंभव ही है। किन्तु करने ही होंगे। हमें विरोध करना होगा। चापलूसों को हराना होगा। तो ही नेतृत्व उन्हें हटाएंगे। नहीं तो नेतृत्व ही हट जाएंगे।
 

 
 
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