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तटीय इलाकों में मुद्दा मोदी नहीं कांग्रेस
Publish Date :
04/19/2014

वाल्टेयर। ओडिशा और सीमान्ध्र में मुद्दा मोदी बल्कि कांग्रेस है ।यह बात ओडिशा के एक हिस्से से गुजरते हुए सीमान्ध्र के तटीय इलाके तक पहुँचने के दौरान लोगों से हुई बातचीत से सामने आई ।तीन सौ किलोमीटर से ज्यादा के इस सफ़र में गरीब तबके के लोगों से ज्यादा मुलाक़ात हुई जिसमे ज्यादातर रोजी रोटी की तलाश में रोज भटकने वाले लोग थे ।यह किरंदुल वाल्टेयर पैसेंजर थी ।यह ट्रेन भी अद्भुत थी । बड़ा ही अलग अनुभव ।छतीसगढ़ के जगदलपुर से चलकर किरंदुल वाल्टेयर पैसेंजर ने जैसे ही आमागुडा स्टेशन पार किया बगल के केबिन में चल रहे बंगाली बच्चों का हंगामा शुरू हो गया।मै खिड़की के पास बैठ कर बाहर के बदलते हुए दृश्य को देख रहा था और बीच बीच में विजय शुक्ल से बातचीत भी । छोटे छोटे स्टेशन आते तो ओड़िसा के आदिवासी अलग अलग डिब्बों में चढ़ते दिखते ।हर तरह का सामान ।कुछ सर पर तो कुछ हाथ के थैलों में । शाक शब्जी से लेकर बर्तन तक ।इस बीच एक महिला सर पर घड़ा रखे आई तो लगा सल्फी बेच रही है पर वह मठठा बेच रही थी अलमुनियम के एक गिलास से नाप कर ।साथ ही तरबूज खीरा ,अंगूर और चीकू भी डब्बे में मिल जा रहा था । दोपहर हो गई थी और बाहर की हवा गर्म हो चुकी थी ।हालाँकि खिड़की के पास बैठने पर ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी ।कैमरा साथ था और कई बार ऐसे दृश्य आ जा रहे थे कि भीतर से ही फोटो खींच लेता था ।बाहर खेतों की मिटटी का रंग बदलने लगा था और ट्रेन पहाड़ पर चढ़ने लगी थी ।जंगल के बीच सुरंग भी बार बार आ रही थी ।एक लम्बी सुरंग के बाद हवा में ठंढक महसूस हुई तो देखा किसी नदी से गुजर रहे है और बगल में लाल मिटटी के हरे भरे खेत ।कुछ जगह खेत में काम करती महिलाएं भी दिखी ।डिब्बे में उधम मचा रहे बच्चों की आवाज अब बंद हो चुकी थी ।गलियारे में निकले तो देखा सब थक कर सो चुके है ।साथ चल रहे इलेक्ट लाइन के प्रबंध निदेशक विजय शुक्ल जो लगातार नवरात्र के उपवास पर थे वे चाय पीना चाहते थे पर किसी भी स्टेशन पर उतर कर चाय लेना संभव नहीं था ।ट्रेन मुश्किल से एक मिनट रूकती और अपना डिब्बा प्लेटफार्म से काफी दूर लगता था । कूपे में कोई व्यवस्था भी नहीं थी कि केतली का प्लग लग सके ।पर पता चला दरवाजे के पास स्विच बोर्ड लगा है ।हमने बैग से टी बैग ,मिल्क पाउच के दो सैसे, सुगर क्यूब और केतली निकाली ।ढाई कप पानी डाल कर बाहर उसका प्लग साकेट में लगा दिया तो करीब चार मिनट में पानी खौल चूका था ।कूपे में लौटकर दो कप चाय तैयार की ।विजय शुक्ल को इससे उर्जा मिली वे थक गए थे क्योकि सुबह नाश्ते में भी फल ही लिया था और दोपहर में भी फल ही लेना था ।मेरे लिए होटल से पराठे और दही पैक करा दिया गया था इसलिए कोई समस्या नहीं थी । अपने डिब्बे से जुड़े दुसरे डिब्बे में गया तो कुछ नौजवान मिले ओडिशा के ।कोरापुट तक जा रहे थे ।बातचीत में माओवादी आ गए तो वे वे बोले ,आम लोगों को ये माओवादी कोई नुकसान नहीं पहुंचाते है ।ये तो गड़बड़ करने वालों को दंडित करते है ।ओडिशा का यह हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ है ।इस अंचल को माओवादी छतीसगढ़ से सीमान्ध्र तक एक कारीडोर के रूप में इस्तेमाल करते है ।आज से नहीं काफी काफी पहले से । इस लिहाज से यह ट्रेन भी कम मददगार नहीं है । इसमें आदिवासी अपने हिसाब से चलते है और अपनी संस्कृति के साथ चलते है ।खाना पीना भी इसमें होता है ।इसी वजह से शहरी समाज के लोग जब इस ट्रेन से चलते है तो बाद में वे शिकायत भी करते है ।मुख्य आरोप महिलाओं पर शराब बेचने का लगाते है ।हालाँकि यह सब अपवाद नजर आया ।सल्फी इनके जीवन का अंग है जो एक जगह घड़े से बेचती हुई एक महिला के पास नजर आया ।यह उसका रोजगार है ।ठीक उसी तरह जैसे तरबूज और खीरा बेचने वाली महिला दिन भर में सौ रुपया कम लेती है उसी तरह सल्फी बेचने वाली महिला भी करीब इतना पैसा कम लेती है जिससे दाल चावल और सब्जी आदि खरीदी जाती है । ये सब महंगाई से परेशान थे ।कुछ ने बताया कि दो चार दिन का राशन ही घर में रहता है और आगे के लिए दिन भर खटना पड़ता है ।सरकार महंगाई पर रोक नही लगा पा रही है ।हालाँकि राहुल गाँधी को ये आदिवासी एक भला और ईमानदार नौजवान मानते थे और इंदिरा गाँधी के उतराधिकारी के रूप में भी देखते है ।पर ओडिशा में बीजू जनता दल का असर ज्यादा दिखा ।नया स्टेशन आया तो लोग भी बदले और फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ ।मोदी की इस अंचल में कोई पहचान नहीं है ।गरीब और आदिवासियों के बीच तो बहुत कम लोग यह बता पाए कि मोदी है कौन ।हम जैसे हिंदी पट्टी वालों के लिए यह अलग अनुभव रहा । कोरापुट और अरकू स्टेशन गुजरने के बाद शाम ढल चुकी थी और मिटटी का रंग और आबोहवा भी बदल गई ।पहाड़ों के बीच ठंढ का अहसास हुआ और अब हम आंध्र प्रदेश के तटीय इलाके के पास आ चुके थे ।भाषा भी बदल गई और मुद्दे भी ।सवारियों का सामाजिक स्तर भी बदल गया था ।मध्य वर्ग के लोग भी इस गाड़ी में चढ़ रहे थे जिन्हें विशाखापत्तनम जाना था ।अब राजनीति में चंद्रबाबू नायडू , वाईएसआर और कांग्रेस थी ।मोदी को यहाँ भाजपा के नेता के रूप में पहचाना जा रहा था पर मुख्य तीन दलों से भाजपा पीछे थी ।यहाँ मुद्दा तेलंगाना का था जिससे लोग नाराज थे ।आम लोगों का मानना था कि उनकी आंध्र वाली पहचान ख़त्म कर दी गई और विकसित हैदराबाद दुसरे हिस्से को दे दिया गया ।एक शिक्षिका एन लक्ष्मी ने कहा -इससे समूची नई पीढ़ी प्रभावित होगी ।शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के लिए सीमान्ध्र के लोगों को अब भटकना पड़ेगा ।बच्चो को अच्छे शिक्षा संस्थानों में जगह नहीं मिल पाएगी ।हैदराबाद से भी कारपोरेट क्षेत्र का पलायन होगा जिससे तेजी से विकसित हो रहे इस राज्य का बंटवारा हो जाने से दोनों हिस्सों का नुकसान होगा ।विशाखापत्तनम अविभाजित आंध्र प्रदेश का सबसे चमकता हुआ महानगर है और इसे आप देख भी सकते है ।अन्य तटीय शहरों के मुकाबले तटीय क्षेत्र में यह शहर काफी साफ सुथरा और प्रदूषण से मुक्त नजर आता है।यहाँ उत्तर और दक्षिण की संस्कृति का संगम भी होता है ।पिछली बार आए थे तो रिशिकोंडा के हरिथा प्लाजा बीच रिसार्ट पर रुके थे ।फिर एक शाम यही रिसार्ट के आफशोर बार में ।तब लखनऊ के पत्रकार सागर थे इसबार विजय जो शुद्ध शाकाहारी ।पर यह जगह ऐसी है जहाँ से जल्दी उठने का मन नहीं होता ।पहाड़ से कई सौ मीटर नीचे चंद्राकर समुद्र तट और ठंढी हवा में लहराते नारियल के पेड़ । तटीय इलाकों में मछली लोगों का पसंदीदा व्यंजन है ।हमें शहर के बीच जगदम्बा सेंटर के विनीथा पैराडाइज में भेजा गया ।मछली और चावल का आंचलिक स्वाद लेना था ।और स्वाद न भूलने वाला था ।बहुत ही सस्ता भी ।खाना खाकर लौटे तो देर रात हो चुकी थी और सुबह वापसी थी ।पर जल्दी नींद खुली तो सामने के समुद्र तट पर फिर आ जमे और कुछ फोटो लेने के बाद जाने के लिए निकले । एअरपोर्ट के रस्ते में स्थानीय ड्राइवर बताने लगा कि कांग्रेस जा रही है और चंद्रबाबू नायडू आ रहे है ।भाजपा यहाँ उनकी बी टीम है और इस इलाके में बड़े नेता नायडू है मोदी नहीं ।यह होती है क्षेत्रीय राजनीति जिसे राष्ट्रीय दल के लोग समझ नहीं पाते है ।

 
 
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